आखिर कब तक मारे जाते रहेंगे पत्रकार !

journalist killing in india

नूरूद्दीन

विगत 14 जून को कश्मीर के एक अखबार राइजिंग कश्मीर के संपादक शुजात बुखारी और उनके दो सिक्योरिटी पर्सनल की हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी। इस हत्या से एक बार फिर से बोलने की आज़ादी पर सवाल उठ गया है। इस घटना के विरोध में कश्मीर के कई मुख्य अखबारों ने अपना एडिटोरियल पेज को खाली छोड़ दिया। पत्रकारों की ज़ुबान पर एक बार फिर से आपातकालीन का ज़िक्र आया। 1975 में आपातकालीन के समय मीडिया हाउसों पर छापे पड़े, मीडिया हाउसों की बिजली काट दी गई थी। पत्रकारों को जेल भेज दिया गया था।
25 मार्च को बिहार में दैनिक भास्कर के पत्रकार नवीन निश्चल और उनके साथी विजय सिंह को देर रात एक स्कोर्पियो कुचल देता है वहीं दूसरी ओर मध्यप्रदेश के एक और प्रिंट के पत्रकार संदीप शर्मा को एक ट्रक कुचल देता है।

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पिछले दिनों बिहार में एक पत्रकार की दर्दनाक हत्या हुई थी। इस घटना ने अंतराष्ट्रीय मीडिया को झकझोर कर रख दिया। ‘द डॉन’ और ‘द गार्डजियन’ जैसे अखबारों ने इस घटना को प्रमुखता से उठाया था। ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ एक मानवाधिकार संगठन है जो पत्रकारों के साथ शोषण और अत्याचार के खिलाफ आवाज़ बुलंद करता है, उसने भी इस मामले को उठाया था, वहीं संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया था। संयुक्त राष्ट्र संघ के चीफ एंटेनियो गुटरेज के स्पोक पर्सन फरहानुल हक ने कहा कि दुनिया में कहीं भी पत्रकारों की हत्या और दुर्व्यवहार चिन्तनीय है। वहीं द गार्डजियन ने इस खबर को प्रमुखता देते हुए लिखा कि इस तरह से पत्रकारों की हत्या पत्रकारिता जगत में बढ़ते खतरे का संकेत है।
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पिछले वर्ष 5 सितंबर 2017 को गौरी लंकेश की हत्या धार्मिक कट्टरता के आरोप में कर दी गई थी। वे कन्नड़ टैबलॉयड ‘ गौरी लंकेश पत्रिका’ की संपादक थीं। वे कट्टरतावादी राजनीति की विरोधी थीं और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए काम करने वाली समूह का हिस्सा भी थीं। काफी छानबीन के बाद पुलिस ने एक कातिल को गिरफ्तार कर पूछताछ की तो कातिल ने जो बात बताई वह काफी आश्चर्यजनक है। उसने पुलिस के सामने कबूल किया कि पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या में वो भी शामिल था। पुलिस के काफी पूछताछ करने पर उसने बताया कि “हिन्दुत्व” को बचाने के लिए गौरी लंकेश को गोली मारी पैसे के लिए नहीं। गौरी लंकेश की हत्या के बाद सोशल मीडिया पर उनके प्रति ज़हर उगले गए।
ऐसे कई सारे मामले हैं जिसमे पत्रकारों को मौत के घाट उतार दिया गया। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट के सर्वे के मुताबिक 1992 से अब तक 79 पत्रकारों की हत्या की जा चुकि है वहीं 33 पत्रकारों की हत्या करने के लिए टार्गेट पर लिया गया था।

मई 2016 को “दैनिक हिन्दुस्तान” में एक खबर छपी है जिसके मुताबिक 4 फीसदी मामलों में ही पत्रकारों को इंसाफ मिल सका है बाकि 96 फीसदी अपराधियों को माफी मिल चुकी है। पूरी दुनिया में ऐसे कई देश हैं जहां पत्रकारें को इंसाफ नहीं मिला। भारत इस सुची में 14वें स्थान पर है। पहले नम्बर पर सोमालिया और इराक हैं। इसके अलावा पाकिस्तान और बांगलादेश जैसे देश शामिल हैं। सबसे अधिक प्रिंट के 88 फीसदी पत्रकारों को निशाना बनाया गया था। अखबार के मुताबिक 36 फीसदी मामलों में राजनीतिक दलों के होने का शक था। पत्रकारों के साथ ही कुछ जनसेवकों की भी हत्या कर दी गई जिसमें नरेन्द्र दाभोलकर और गोविन्द पानसरे जैसे लोग शामिल हैं।
सवाल है आखिर कब तक इस तरह से पत्रकारों की हत्या होती रहेगी? क्या भारतीय संविधान से सूचना का अधिकार मिटा दिया जाएगा? क्या बोलने, लिखने की आज़ादी छीन ली जाएगी? क्या पत्राकारों और जनसेवकों पर हमले से ऐसा समझा जाना चाहिए कि अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश लगा दिया जाएगा? पत्रकारों और जनसेवकों पर हमले हो जाते हैं तो आम नागरिकों का क्या होगा? जब पत्रकार ही डर के साये में पत्रकारिता करेगा तो कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका कैसे पार्दर्शिता से काम करेंगी। सत्ता से सवाल पूछने का हक, छीन लिये जाने की तैयारी तो नहीं है?

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